सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

मधुमेह (चीनी ) की बिमारी में गूलर ( cluster fig ) बहुत ही लाभदायक होता है ।


मधुमेह (चीनी ) की बिमारी में गूलर ( cluster fig ) बहुत ही लाभदायक होता है । गूलर ( clusrer fig ) के गुण गूलर के सेवन से मधुमेह , फोड़ा , अतिसार , खांसी जुकाम , स्त्रियों में रक्त प्रदर दूर हो जाते है साथ ही इसे पुरुषो में मर्दानी ताकत एवं वीर्य बृद्धि भी होती है ।


 गूलर के पेड़ प्राय पुरे भारत में पाये जाते है ।इसके पेड़ लगभग 30 से 50 फुट ऊँचे होते है । इसमें फूल नही आते । इसलिए इसे अपुष्पा भी कहते है ।इसमें गुच्छो के रूप में फल आते है , जो शुरू में हरे होते है पकक जाने पर लाल हो जाते है ।इसके तने को गोदने से दूध निकलता है जी कुछ ही क्षणों में पीला पड जाता है । इसे बिभिन्न भाषाओ में अलग अलग नामो से जाना जाता है । संस्कृत में - उदुम्बर , अपुष्पा ।हिंदी में - काकमाल , गूलर । मराठी में - उम्बर ।तमिल में - खारसा । बतेलगु में - राइगा। बंगाली में - यज्ञ - डुम्बुर । यह शीतल , कसैला , मधुर , कफ पित्तनाशक , सूजन वेदना , दाह , अर्श , मधुमेह , रक्त - पित्त , रक्त - प्रदर , प्रमेह , का नाश करने वाला होता है ।साथ ही स्तम्भक , गर्भाशय -शोधनाशक , घाव , रक्तदोष मिटाकर रंग निखारने वाला होता है ।

 लाभ एवं प्रयोग विधि :-

 ( 1 ) मधुमेह में :-  200 ग्राम गूलर के पक्के हुए फल , 200 ग्राम गूलर के कच्चे फल , एवं 200 ग्राम जामुन की गुठली , इन सब को सुखाकर कूटकर चूर्ण बनाले । प्रतिदिन 10 ग्राम की मात्रा में 2 या तिन बार ठंडे पानी से ले । इसे खून में चीनी की मात्रा बढ़ नही पाती और धीरे - धीरे चीनी कम होती जाती है । 

 ( 2 ) मर्दानी ताकत एवं वीर्य -बृद्धि में : - 50 ग्राम गूलर के पक्के हुए फल , 50 ग्राम विदारीकन्द इन दोनों को कूट कर चूर्ण बनाले ।सुबह शाम 4 से 5 ग्राम की मात्रा में एक ग्लास दूध में एक छोटी चम्मच शुद्ध देशी घी के साथ मिलाकर पीले ।इसके सेवन से कुछ ही दिनों में बल वीर्य बढ़ जाता है ।ध्यान रहे जिसका पाचन शक्ति कमजोर हो वे इसका सेवन न करे । दूसरी विधि :- बताशे में गूलर का दुध भर कर सुबह - शाम खाले इसे 15 से 20 दिनों में अपार ताकत एवं बल- वीर्य बढ़ जाती है । प्रयोग काल में यथा संभव सम्भोग से बचे ।

( 3 ) स्त्रियों के रक्त -प्रदर में :- गूलर की ताज़ी छाल 10 ग्राम को मोटा कूट कर उसे 125 ग्राम पानी में उबाले , जब एक चौथाई रह जाय तो उसे आग से उतारकर छान ले और उसमे पीसा हुआ सफेद जिरा 1 ग्राम एवं 10 ग्राम मिश्री मिलाकर पि ले ।इस तरह सुबह शाम लेने से रक्त प्रदर ठीक हो जाता है ।

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

हिस्टीरिया , पागलपन , मिरगी एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाने में शंखपुष्पी एक अचूक औषधि है ।


हिस्टीरिया , पागलपन , मिरगी एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाने में शंखपुष्पी एक अचूक औषधि है ।

शंखपुष्पी सामान्य रूप से पथरीली , रेतीली , एवं सख्त जमीन पर होती है । यह पुरे भारत में सड़को के किनारे बगीचो आदि में देखने को मिल जाती है । यह सालो भर पाई जाने वाली औषधि है । इसे संस्कृत में- क्षीरपुष्पी , हिंदी में - शंखपुष्पी , मराठी में - साखखेल , बंगाली में - डानकुणी , गजराती में - शंखावली , लैटिन में - कनवालबुल्स , प्लुरिकॉलिन्स आदि नामो से जाना जाता है । शंखपुष्पी के पौधा लगभग 4 से 5 इंच ऊँचा होता है ।इसकी छोटी छोटी शखाये जमीन पर फैली होती है ।इसके पत्ते बिना डंठल के हल्की सी सफेद आभा लिए हुए जामुनी रंग होते है ।इसके पत्ते पर मुलायम रोम होते है । इसके फूल सफेद , नील या हल्का गुलाबी रंग के शंख के अकार के होता है ।इसलिये इसे शंखपुष्पी कहते है ।इसके फूल में पांच पात्र होते है ।इसके फल लम्बे , चिकने , और भूरे रंग के होते है ।जिसके अंदर भूरे या काले रंग के बिज होते है ।शंखपुष्पी तीन प्रकार के होते है नीले फूल वाली , लाल फूल वाली , एवं सफेद फूल वाले ।इनमे सफेद फूल वाली ही लाभप्रद एवं उपयोगी होता है ।हमेशा सफेद फूल वाली ही शंखपुष्पी वाले पौधे का ही औषधि के रूप में प्रयोग करनी चाहिए । यह कषाय , कटु , चिकनी , शांतिप्रदायक , मधुरबिपाकि, वात- पित को शांत करने वाली एवं दाहनाशक है । यह मष्तिष्क रोगों के लिए बड़े ही लाभकारी होता है ।यह स्नायु को बल देने वाली , ह्रदय को ताकत देने वाली , स्वर को ठीक करने वाली एवं रक्त को शुद्धि करने वाली है ।इसके सेवन से स्मरण शक्ति बढ़ती है । इसका प्रयोग किसी भी उम्र के व्यक्ति कर सकते है ।

 शंखपुष्पी के प्रमुख फायदे :-


 ( 1 ) हिस्टीरिया में - हिस्टीरिया के रोग में यह संजीवनी का काम करता है । मुलहटी 5 ग्राम शनतावर 5 ग्राम वच 2 ग्राम एवं शंखपुष्पी 5 ग्राम । इन सब को कूट पीस कर चूर्ण बनाले ।एवं इसके चार मात्रा बनाले ।सुबह शाम एक एक मात्रा दूध के साथ ले ।इस प्रकार कुछ ही दिनों में हिस्टीरिया रोग ठीक हो जाता है ।पागलपन के लक्ष्णों में भी आराम मिलता है ।इसे स्त्रियों के गर्भाश्य की दुर्बलता भी दूर होती है ।


 ( 2 ) पागलपन में - 20 से 25 बून्द शंखपुष्पी के रस को पिने से पागलपन , मिरगि , चिट में व्यकुलता आदि बहुत जल्द ठीक हो जाता है ।इस रस से पेट भी साफ़ हो जाता है ।


 ( 3 ) स्मरण शक्ति बढ़ाने में :-शंखपुष्पी के पत्ता , फल , फूल , बिज एवं जड़ इन सबको मिलाकर धुप में सुखा कर कूट ले एवं कपड़े से छान कर 4 से 5 ग्राम चूर्ण दूध या ठंडे पानी के साथ सुबह शाम ले ।इसे दिमाग को ताकत मिलता है और स्मरण शक्ति बढ़ती है ।बच्चों को आधी मात्रा में देनी चाहिए ।

द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) Leueus aspera साँप के काटने पर जहर को बेअसर करने का एक असरदार औषधि है ।


द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) Leueus aspera साँप के काटने पर जहर को बेअसर करने का एक असरदार औषधि है ।


 द्रोणपुष्पी जिसे हम गुम्मा के नाम से भी जानते है ।यह पुरे भारत में पाया जाता है । यह विशेष कर ईंख के खेतो में मिल जाता है ।हिमालय के पहाड़ो पर बहुतायत मात्रा में मिलता है । इसे हिंदी में - गुम्मा , दणहली । मराठी में - तुंबा ।संस्कृत में द्रोणपुष्पी । तमिल में - तुम्बरी ।तेलगु में - मयपातोसि ।बंगाली में - हलक्स , पलधया ।गुजराती में -कुबो आदि नस्मो से जाना जाता है । द्रोणपुष्पी के पौधा दो से चार फुट लम्बा एवं चार - पांच शाखाओं वाली गुम्बजकार होता है । द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) के पौधे पर सफेद रंग के छोटे छोटे रोयें होते है ।इसके पत्ते 2-3इंच लम्बे रोयेदार एवं दांतेदार किनारे वाले होते है ।इसके फूल प्याले जैसे आकृति के सफेद और गुच्छेदार होते है ।फूल के प्रत्येक गुच्छे पर दो पत्तियां लगी रहती है ।इसके जड़ पतली एवं 5 से 6 इंच लम्बे होते है । जिसकी गन्ध तेज होती है । इसका प्रयोग से अनेको रोग दूर हो जाते हैं ।यह उदर - रोग , बिष दोष , यकृत विकार , पक्षाघात आदि में बहुत ही लाभप्रद औषधि है ।

 प्रमुख लाभ -



 ( 1) विषम -ज्वर - गुम्मा या द्रोणपुष्पी के टहनी या पट्टी को पीस कर पुटली बनाले और उसे बाए हाथ के नाड़ी पर कपड़ा के सहयोग से बाँध दे । इसे रोगी का ज्वर बहुत ही जल्द ठीक हो जाता है ।

 ( 2 ) सुखा रोग में - सुखा रोग ख़ास कर छोटे बच्चों को होता है । गुम्मा के टहनी या पत्ते को पिस कर शुद्ध घी में आग पर पक्का ले और ठंडा होने के बाद इस घी से बच्चे के शरीर पर मालिश करे ।इस सुखा रोग बहुत ही जल्द दूर हो जाता है ।

 ( 3 ) साँप के काटने पर :- किसी भी व्यक्ति को कितना भी जहरीला साँप क्यों न काटा हो उसे द्रोणपुष्पी के पत्ते या टहनी को खिलाना चाहिए या इसके 10 से 15 बून्द रस पिला देना चाहिए ।अगर वयक्ति बेहोश हो गया हो तो गुम्मा (द्रोणपुष्पी ) के रस निकाल कर उसके कान , मुँह और नाक के रास्ते टपका दे ।इसे व्यक्ति अगर मरा नही हो तो निश्चित ही ठीक हो जाएगा ।ठीक होने के बाद उसे कुछ घण्टे तक सोन न दे ।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

गिलोय (heart leaves ) के गुण - गिलोय ज्वर , प्रमेह , स्वेत प्रदर , सुजाक , बावासीर , बल वीर्य बृद्धि एवं रोगों के बाद शारीरिक कमजोरी को दूर करने का कारगर औषधि है ।



गिलोय (heart leaves ) के गुण - गिलोय ज्वर , प्रमेह , स्वेत प्रदर , सुजाक , बावासीर , बल वीर्य बृद्धि एवं रोगों के बाद शारीरिक कमजोरी को दूर करने की कारगर औषधि है । 


गिलोय का पौधा पुरे भारत में पाया जाता है ।इसे लोग अपने बाग़ बगीचो में भी लगाते है । यह बहुत ही गुणकारी पौधा है । गिलोय के तने पर घूसर रंग के पतली सी छाल होती है जिसे छिलने पर हरा रंग दिखाई देता है । इस पर छोटी छोटी गाँठ होती है ।इसके पत्ते चिकने दिल के अकार के 3 से 4 इंच लम्बे एवं चौडा होता है । गर्मी के दिनों में इसमें गुच्छो के रूप में पिले फूल आते है ।इसके फल भी गुच्छो के रूप में आते है जो कच्चे होने पर हरा एवं पकने पर लाल होता है । इसके फल के अंदर मिर्चा के बिज की तरह सफेद बिज होता है ।गिलोय बेल के रूप में लगता है जो पेड़ो और पहाड़ो के सहारा लिलार बढ़ता है । अगर यह निम् के पेड़ पर चढ़ जाय तो इसे निम् गिलोय कहते है जो ज्यादा गुणकारी होता है ।

     यह ज्वर , वमन , यकृत रोग , प्रमेह , पीलिया , रोग के बाद आई कमजोरी , कृमि , चर्म रोग आदि का नाश करती है ।गिलोय ह्रदय को बलदायक , कफ नाशक , रक्त शोधक , वीर्यवर्द्धक , तनावनाशक एवं पौष्टिक होता है ।


 गिलोय  के अनेको फायदे है जो इस प्रकार है । गिलोय के फायदे :- 



 ( 1 ) ज्वर में :- 5 ग्राम गिलोय , 4 ग्राम अजवायन , छोटी पीपल 2 नग , काली मिर्च 5 नग इन सब को मिलाकर पानी में उबाल ले एयर फिर इसे छान कर गुनगुने मरीज को दे इसे ज्वर में बहुत ही लाभ होता है ।

 (2)बिषम ज्वर में :- गिलोय के ताजा रस 8 से 10 ग्राम प्रतिदिन 2 से 3 बार दे ।इसे बिषम ज्वर भी ठीक हो जाता है ।

 ( 3 ) प्रमेह में : - गिलोह का रस 10 ग्राम शहद के साथ कुछ दिनों तक ले इसे प्रमेह नष्ट हो जाता है ।

 ( 4 ) प्रदर में :- अशोक के छाल के काढ़े के साथ गिलोय के सत्व 1 ग्राम रोजाना 3 बार दे ।इस प्रकार से कुछ दिनों तक लगातार लेने से स्वेत प्रदर और रक्त प्रदर दोनों ही दूर हो जाते है ।

 ( 5 ) सुजाक में :- गिलोय के काढ़े को दूध में मिलाकर पिने से कुछ ही दिनों में सुजाक नष्ट हो जाता हैं ।

 ( 6 ) यौन ताकत और वीर्य- बृद्दी के लिये :- 5 ग्राम लौहभस्म , 5 ग्राम बंगभस्म, 5 ग्राम अभ्रक भस्म , 5 ग्राम छोटी पीपल , 5 ग्राम छोटी इलाइची , एवं 10 ग्राम गिलोय का सत्व , इन सब को मिलाकर रखले और रोजाना सुबह शाम आधा ग्राम शहद के साथ चटनी की तरह चाट ले ।और ऊपर से एक ग्लास गुनगुने दूध पीले। इसे शारीरिक थकान , नपुंसकता , निर्बलता , और कमजोरी मीट जाती है ।

 (7) बावासीर में :- 1 ग्राम बंशलोचन , 10 ग्राम मिश्री , 5 पीस छोटी इलाइची , और 6 ग्राम निमगिलोय । इन सबको पीसकर 10 मात्रा बनाले और रोजाना एक मायरा खाये ।दस दिनों में हर प्रकार के बवासीर ठीक हो जाएगा ।

 ( 8 ) रोग के बाद कमजोरी में :- शितोपलादि चूर्ण 50 ग्राम , प्रवाल पिष्टी 5 ग्राम , गिलोय सत्व 30 ग्राम , इन सब को मिलाकर पीसकर रखले और दो दो चम्मच सुबह शाम शहद के साथ चाटे और ऊपर से एक ग्लास गुनगुने दूध ले । एक से दो माह में ही निर्बलता मिट जायेगी और नई जीवन शक्ति आजायेगी ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

कब्ज , पेचिश , वायु- विकार , स्तन -रोग , यौनांगों में दर्द , जोड़ो में दर्द आदि में अरण्डी ( एरण्ड ) castor का तेल बहुत ही कारगर औषधि है ।


कब्ज , पेचिश , वायु- विकार , स्तन -रोग , यौनांगों में दर्द , जोड़ो में दर्द आदि में अरण्डी ( एरण्ड ) castor का तेल बहुत ही कारगर औषधि है ।


 अरण्डी पुरे भारत में पाया जाता है ।समशीतोष्ण और उष्ण कटिबन्ध जलवायु वाले स्थान पर विशेष रूप से मिलता है । इसे भिन्न भिन्न भाषाओ में अलग अलग नामो से जाना जाता है ।संस्कृत में - एरण्ड , पंचगुल । हिंदी में - अरण्डी , अंडी , रेंडी । मराठी में - धोली एरण्डो । बंगाली - भरेंडा आदि नामो से जाना जाता है । अरण्डी के पेड़ लगभग 10 से 15 फुट ऊँची होती है । इसके पत्ते गोल , 6 से 7 भागो में बीते हुये तथा स्वेताभ् हरे होते है ।इस पर केसरी - पिले या लाल - बैगनी फूल आते है ।इसके फल कंटीले , हरे गुच्छो में और कठोर परत वाले तिन बीजो से युक्त होते है ।यह लाल और सफेद दो प्रकार के होता है ।

अरण्डी के गुण :- यह कृमि नाशक , कफ नाशक , वीर्यवर्द्धक , गर्भाशय शुद्दिकर्ता कब्ज , बावासीर , भगन्दर आदि अनेको रोग में इसका तेल बहुत ही उपयोगी होता है । 

 ( 1 ) कब्ज -एक ग्लास दूध में एक चम्मच अरण्डी के तेल मिलाकर रात को सोने से पहले पिले ।इसे सुबह खुल कर मल्ल त्याग होगा । जरूरत पड़े तो इसे तीन - चार दिन ले । 

 ( 2 ) पेचिश :-खुनी और आंव दोनों तरह के पेचिश में एरण्ड का तेल 2 से 3 छोटे चम्मच ले ।इसे पेचिश में आराम मिलता है । 

 ( 3 ) वायु - विकार : -सोंठ 5 ग्राम , एरण्ड की जड़ 10 ग्राम इन दिनो को मोटा कूट कर और 200 ग्राम पानी में उबाले जब एक चौथाई रह जाए तो तो इसमें थोड़ी सी गुड़ मिलाकर पिये ।कुछ दिनों तक प्रतिदिन 2 बार ले ।इस प्रयोग से कमर दर्द , सर्वांग वात- वेदना , आमवात , उदरवात आदि में बहुत ही लाभ होता है । 

 ( 4 ) जोड़ो में दर्द :- कहीँ के भी जोड़ो के दर्द में अरण्डी ( रेंडी ) के पत्ता पर सर्सो के तेल लगाकर आग पर गर्म कर कपड़ा से जहां दर्द हो वहा बाँध दे ।कुछ दिनों के प्रयोग से जोड़ो का दर्द ठीक हो जाता है । 

 ( 5 ) स्तन - रोग :-यदि स्तन की घुंडी फट गई हो तो उसपर अरण्डी का तेल लगाये । दो से चार दिनों में ठीक हो जाएगा । स्तन में सूजन हो गया हो तो उस पर अरण्डी के पत्ते पर अरण्डी के ही तेल लगाकर बंका गर्म करकर अच्छी तरह से कपड़े के सहयोग से बाँध दे । इसे स्तन के सूजन में बहुत ही लाभ होता है ।

( 6 ) यौनांग में दर्द - स्त्रियों के यौनांग में दर्द हो तो अरण्डी के तेल को रुई में भिगोकर यौनांग के अंदर कुछ देर तक रखे । इसे यौनांग के दर्द दूर हो जाता है ।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

ईसबगोल ( spogel seeds ) के सेवन से कब्ज , अतिसार (दस्त) बवासीर , अनैच्छिक वीर्यपतन , स्त्रियों में रक्तस्राव आदि अनेको रोग दूर हो जाते है ।


ईसबगोल ( spogel seeds ) के सेवन से कब्ज , अतिसार (दस्त) बवासीर , अनैच्छिक वीर्यपतन , स्त्रियों में रक्तस्राव आदि अनेको रोग दूर हो जाते है ।

ईसबगोल प्रायः उष्ण - कटिबन्धीय स्थानो में पाया जाता है । यह भारत में पंजाब , मैसूर , बंगाल एवं भारत के उत्तर - पश्चिम क्षेत्र में बहुतायत मात्र में पाया जाता है । इसे संस्कृत में - अश्वकर्णबीज , वश्वगल ।बंगाली में - इसबगुल , गुजराती में - ऊधमी जीरु । हिंदी में - ईसबगोल एवं लैटिन में प्लैन्टेगो ओवेटा कहते है । इसका पौधा डंठल रहित , छोटा रोमयुक्त तथा 2 से 3 फुट लम्बा होता है ।इसकी पत्तियां लगभग आधा इंच चौड़ा एवं 4 से 6 इंच तक लम्बा होता है । इसकी टहनियों से गेहूं के बाल की बाली जैसी फूलो की लम्बी फर निकलते है ।इसके फलो की मंजरियाँ गुच्छेदार होती है और इसमें झिल्लियुक्त , चिकने , पिलाभ भूरे बिज होते है । इन बीजो को कूटकर इसके ऊपर के झिल्ली से अलग कर ईसबगोल की भूसी तैयार की जाती है । ईसबगोल की भूसी के अनेको फायदे है ।यह ग्राही , मूत्रल , शीतलता , वायु - कारक , कब्ज नाशक , मधुर एवं पौष्टिक होता है ।यह दाह , कब्ज , आंत रोगों तथा घाव आदि रोगों का नाशक होता है ।आमाशय और आंतो को बल देता है । शरीर में शीतलता प्रदान करता है । पर इसका ज्यादा दिनों तक सेवन से शरीर में दर्द मासपेशियों में दुर्बलता आदि विकार पैदा होती है । इसलिये इसका ज्यादा दिनों तक सेवन नही करनी चाहिए ।

 ईसबगोल के प्रमुख फायदे - 


 ( 1 ) कब्ज में -दो चम्मच ईसबगोल की भूसी रात को सोने से एक घन्टा पूर्व एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ ले ।इसे सुबह पेट की साड़ी कब्ज साफ़ हो जायेगी । अगर पुरानी कब्ज हो तो 4 से 5 दिनों तक सेवन करनी चाहिए ।इसे पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाता है । दूसरी विधि :- एक छोटी ग्लास दूध में दो छोटी चम्मच ईसबगोल की भूसी में लगभग 5 मिली . अरण्डी के तेल मिलाकर रोगी को रात को पिलादे इसे अगली सुबह पेट साफ़ हो जाता है ।जरूरत हो तो 3 से 4 दिनो तक देनी चाहिए । 


 ( 2 ) दस्त ( अतिसार ) :- ठंडा पानी या मट्ठा के साथ पांच से छः ग्राम ईसबगोल के भूसी को लेने से दस्त में आराम मिलता है ।इस प्रकार इसे 2 से 3 दिन के प्रयोग करनी चाहिए । 


 ( 3 ) बवासीर में :- लगभग 200 ml मट्ठा के साथ एक बड़ी चम्मच ईसबगोल की भूसी प्रतिदिन 3 बार ले ।इसका एक महीनो तक सेवन से हर प्रकार का बवासिर ( खुनी या वादी ) समाप्त होजाता है । 


 ( 4 )अनैच्छिक वीर्यपात :- दिन में दो बार दो चम्मच ईसबगोल की भूसी शिंदे पानी से ले इसे अनैच्छिक वीर्यपतन की शिकायत दूर हो जाती है । 


 (5) स्त्रियों में रक्तस्राव :- मट्ठे के या ठंडा पानी के साथ दो चम्मच ईसबगोल की भूसी से स्त्रियों में रक्त प्रदर , मूत्राशय से खून आना धीरे धीरे समाप्त हो जाता है । इसे प्रतिदिन सुबह शाम ले ।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

बवासीर , कफ - विकार , गाँठ -सूजन , मासिक विकार का अचूक औषधि है अमलतास ( Pudding pipe tree )


बवासीर , कफ - विकार , गाँठ -सूजन , मासिक विकार का अचूक औषधि है अमलतास ( Pudding pipe tree ) अमलतास के पेड़ के सारे भाग औषधि के काम आता है ।आयुर्वेद में इसका विस्तृत वर्णन है ।


अमलतास का पेड़ भारत के सभी भागो में पाया जाता है ।यह स्वयं से उगने वाला वृक्ष है पर अति गुणकारी होने के कारण लोग इसे अपने फुलवारी में भी लगाते है । अमलतास का पेड़ करीब 8 से 12 मिटर ऊंचा होता है ।इसकी अधिकतम मोटाई एक से सावा मित्र तक होता है ।इसके पत्ते हरे और अंडाकार होते है । इसके बृक्ष में पतझड़ से जून तक इसमें फूल आते है जिसमें पांच पंखुड़िया होती है ।इसके फूल के रंग पिले होते है ।इसके फल एक से दो फुट लम्बे होते है । इस फल के अंदर छोटे छोटे खाने होते है ।प्रत्येक खाने के अंदर 2 से 3 बिज होते है । इस खाने के अंदर चिपचिपा काल गुदा होता है ।यही गुदा गुदा मुख्यतः औषधि के काम आता है । इसके अनेको फायदे है ।

इसके मुख्य फायदे निम्न है । 

 ( 1 ) कब्ज - अमलतास के फल के अंदर के गूदे को रात में एक ग्लास पानी में फुलाकर रख दें । और सबेरे खाली पेट बिना कुछ खाये इस पानी को छान कर पिले । दो चार दिनों में पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाती है । दूसरी बिधि - 10 ग्राम अमलतास के गूदे , 5 ग्राम बड़ी हरड़ के छिलके को लगभग 250 ग्राम पानी रखकर आग पर पकाये जब पक कर एक चौथाई रह जाय तो 8 से 10 ग्राम गुड़ मिलाकर हल्का गुनगुने ही पी जाए । इसके पीने के दो - तिन घण्टे के बाद ही एक दस्त होगा जिसमे पुराना मल निकल जाता है और पेट साफ़ हो जाता है ।और कब्ज ठीक हो जाता है । 

 ( 2 ) बवासीर - बवासीर में अमलतास के 10 ग्राम गुदा , बड़ी हरड़ 5 ग्राम , मुनक्का ( बिज निकाली हुई 10 ग्राम एक ग्लास पानी में पकाये । जब पक कर एक चौथाई रह जाय तो इसे छान कर हल्का गुनगुने सुबह शाम पी जाए । इसे सात दिनों के अंदर पुरानी से पुरानी कब्ज ठीक हो जाता है और साथ ही बावसिर के मसे छोटे होने लगते है ।और इस तरह धीरे धीरे बावसीर समाप्त हो जाता है । 

 ( 3 ) मासिक - विकार - : अमलतास के गुदा 20 ग्राम सोंठ 10 ग्राम , निम् की छाल 5 ग्राम , । इन सबक कूट ले फिर इसमें 20 ग्राम मीठा मिलाकर 300 ग्राम पानी में पकाये जब पानी एक चौथाई रह जाए तो इसे आग से उतारकर छान ले ।और मासिक अवधि में इसे प्रतिदिन सुबह पीये ।इसके प्रयोग से मासिक खुलकर होगा और सभी तरह के मासिक विकार दूर हो जाएंगे । 

 (4 ) कफ में -: 20 ग्राम अमलतास के गुदा और 20 ग्राम मिश्री को पीस कर चटनी बनाले और दिन में तीन चार बार चटनी की तरह चाटे ।इसे कुछ ही दिनों में फेफड़ो में जमा कफ पिघल कर आसानी से निकल जाता है । 

 (5 ) गाँठ या सूजन में - अमलतास के गुदा 30 ग्राम , कपूर 2 ग्राम , जौ के आटां 30 ग्राम को तीसी के तेल में मिलाकर इसे गर्म करके किसी कपड़े पर फैलाकर गाँठ या सूजन पर बांधे ।कुछ ही दिनों में गाँठ बैठ जाएगा या पक कर बह जाएगा ।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

माहवारी विकार , योनि के घाव एवं लड़कियो के त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर बनाने में अशोक के छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


माहवारी विकार , योनि के घाव एवं लड़कियो के त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर बनाने में अशोक के छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


 अशोक का पेड़ 15 से 20 फुट लम्बा जो सालो भर हरा भरा होता है ।यह पुरे भारत में पाया जाता है ।

             इसे अलग अलग भाषाओ में अलग अलग नामो से जानते है । इसे संस्कृत में - रक्तपल्लव , हेमपुष्प । हिन्दी में - अशोक ।बंगाली में - आसोपालव । मराठी में - अशोषक । लैटिन में - जोनोसिया अशोका के नाम से जानते है ।

           अशोक के वृक्ष बहुत ही लाभदायक होता है ।इसके पत्ते का उपयोग घर में पूजा , समारोह आदि में शुभ मानकर दरवाजे पर सजावट के रूप में किया जाता है । बहुत से लोग अपने घर के दरवाजे पर भी इसे सुंदरता के लिए लगाते है ।

      इसके प्रमुख लाभ - 

  ( 1 ) माहवारी विकार में -स्त्रियों को माहवारी सम्बन्धी किसी भी प्रकार के गड़बड़ी में अशोक के छाल दूध में उबालकर ठंडा होजाने के बाद सुबह कुछ दिनों तक नियमित पिने से माहवारी संबन्धी सारी विकार समाप्त हो जाता है साथ ही गर्भाशय की सूजन एवं दर्द भी मिट जाता है । 


 ( 2 ) सुंदरता बढ़ाने के लिए - 2 चम्मच अशोक के छाल के रस , 2 चम्मच सरसों के तेल , एवं 1 चम्मच गेहूं के आटां । इन सबको खूब बढ़िया से मिलाले फिर इसमें थोड़ी सी दूध दाल कर हाथ , मुँह पर उबटन की तरह लगाये ।लगाने के 15 से 20 मिनट के बाद पानी से धो ले ।इसके नियमित प्रयोग से कुछ ही दिनों में त्वचा गोरी , कोमल और सुंदर हो जायेगी ।


 ( 3 ) योनि के घाव - अशोक के पेड़ के छाल को पानी में उबाल कर उसे छान कर योनि के घाव को धोये कुछ ही दिनों में योनि की घाव ठीक हो जाएगें ।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

इमली के बीज से मर्दाना ताकत बढ़ता है ।


इमली के बीज से मर्दाना ताकत बढ़ता है ।


 इमली वैसे तो पुरे भारतवर्ष में मिलता है । इमली का पेड़ लगभग 10 से 50 फुट लम्बा होता है इसके पत्ते निम् के पत्ते की तरह होते है । इसके फल बहुत ही खट्टे होते है ।यह स्त्रियों को बहुत ही पसन्द है ।इमली के पत्ते छाल एवं फल भी बहुत लाभदायक होता है ।पर इमली के बिज के गुण के बारे में बहुत ही कम लोगो को जानकारी है । इमली के बीज बहुत लाभकारी होता है । इमली के फल को प्रयोग में लाने के बाद के बाद प्रायः लोग इसके बिज को फेक देते है ।

 इमली के बिज के फायदे - मर्दाना शक्तिवर्धक , स्वप्न दोष , वीर्यवर्धक और स्त्रियों के प्रदर रोग में भी बहुत फायदेमंद होता है । 

 इसके प्रयोग के प्रथम बिधि -: इमली के बीज 100 ग्राम लेकर इसे भून लीजिये। भून लेने के बाद इसे कूटकर छान ले । इसमें बुरा खांड 100 ग्राम मिला ले। इसके दो चम्मच प्रतिदिन सुबह गर्म दूध से ले। यह स्वप्न दोष और मर्दाना ताकत बढ़ाने में लाभदायक हैं। स्त्रियों का प्रदर भी इससे ठीक होता हैं। इसके प्रयोग के एक दूसरी बिधि -:  इमली के बीज100 ग्राम को 2 से 3 दिन पानी में भिगोये और फिर इसके छिलके को उतार कर छाया में सुखाले। सूख जाने के बाद इसे महीन पीस ले और और उस चूर्ण में समान भाग मिश्री मिलाकर पीसे ले ।फिर एक चौथाई चम्मच प्रतिदिन सुबह शाम दूध के साथ इस चूर्ण को ले। एक से दो महीने के सेवन से शीघ्र पतन दूर होगा, वीर्य गाढ़ा एवं मर्दाना ताकत में अभूतपूर्व बृद्धि हो जाती है ।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

लहसुन पुरुषो के लिए यौन शक्ति दायक है ।



लहसुन पौरुष बल को बढ़ाता है साथ ही शरीर को पुष्ट करता है । घरेलू नुस्खे

लहसुन पुरुषो के लिए यौन शक्ति दायक है ।यह किसी भी किरने ( पसारी )के दुकान पर मिला आसानी से मिलजाता है । मर्दाना ताक़त, जोड़ो का दर्द , (सन्धिवात ), सायटिका, हिचकी, श्वास, सिर दर्द, अपस्मार, गुल्म, उदर रोग, प्लीहा, कृमि, शौथ, अग्निमान्ध, पक्षाघात, खांसी, शूल आदि के लिए उत्तम औषिधि – लहसुन पाक। लहसुन पाक शीतकाल में पोष्टिक आहार के रूप में वाजीकारक योग हैं। विवाहित पुरुषों के लिए यौन शक्तिदायक वृद्धक तो होता ही है साथ ही शरीर की सप्त धातुओं को पुष्ट और सबल करके शरीर को सुडौल और बलवान बनाने वाला भी है। आइये जाने लहसुन पाक तैयार करने की विधि।

 लहसुन पाक तैयार करने की विधि - 100 ग्राम लहसुन की कलियोँ को छिलका अलग करके छोटे-छोटे टुकड़े कर लें।और एक लीटर दूध में एक गिलास पानी डाल कर लहसुन के सभी टुकड़े डाल दें और आग पर गरम होने के लिए रख दें। जब दूध गाढ़ा हो जाये और तब उतार कर ठंडा कर लें और उसे पीसकर लुगदी बना लें।फिर शुद्द देशी घी में इस लुगदी को धीमी आंच पर पकाये । जब लाल हो जाये तब इसे उतार लें । अब इसमें आवश्यकतानुसार शक्कर की चाशनी तैयार करें। भुनी हुई लुगदी और 1 ग्राम केशर , 2 ग्राम लौंग , 2 ग्राम जायफल , दालचीनी 2 ग्राम , और सौंठ 5 ग्राम इन सबको बारीक़ पीसकर चाशनी में डाल दें और भली-भांति मिला लें और थाली में फैला कर जमा लें अब आपका लहसुन पाक तैयार हो गया । प्रयोग विधि यह लहसुन पाक रात को सोने से पहले एक चम्मच गुनगुने दूध के साथ कम से कम दो महीने तक सेवन करे । इसके सेवन से जोड़ो का दर्द , सायटिका , हिचकी , श्वास , सिर दर्द, गुल्म , उदर रोग , प्लीहा ,कृमि ,शौथ , अग्निमान्ध, पक्षाघात, खांसी, शूल, आदि अनेक रोगों को निरोगी बनाने में सहायक होता है तथा स्नायविक संस्थान की कमजोरी, व् यौन शिथिलता दूर करके बल प्रदान करता है। एसे रोगों से ग्रस्त रोगी के अलावा यह लहसु पाक प्रौढ़ एवम वृद्ध स्त्री पुरुषों के लिए शीतकाल में सेवन योग्य उत्तम योग है।

इसका सेवन यथा सम्भव गर्मी के मौसम में न करे ।

ह्रदय रोगी के लिये अर्जुन का छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।



ह्रदय रोगी के लिये अर्जुन का छाल बहुत ही लाभकारी होता है ।


 अर्जुन का पेड़ लगभग 80 फुट तक लम्बा होता है ।इसका छाल सफेद होता है और अंदर से गुलाबी होता है ।इसके पत्ते लगभग 2 इंच चौड़े और 5 से 6 इंच लम्बे होते है । वैसे तो अर्जुन का पेड़ पुरे भारत में पाया जाता है ।पर बहुतायत मात्रा में अर्जुन के पेड़ हिमालय के तराई क्षेत्र , उत्तर प्रदेश , बिहार , मध्य प्रदेश , एवं मुम्बई में मिलता है ।

   भारत के अलग अलग प्रदेशो में अलग - अलग नामो से जाना जाता है ।इसे संस्कृत में - ककुभ, अर्जुन , पार् हिंदी में- कोह , अर्जुन । मराठी में - अर्जुन सादड़ा ।तमिल में - मरुतै । तेलगु में - तेल्ल - मदिद ।लैटिन में - टर्मिनेलिया अर्जुना आदि नामो से जाना जाता है ।

 वैसे तो इस पेड़ के छाल बहुत ही लाभकारी होता है । यह शक्तिदायक , पुष्टिदाता , प्रमेह और रक्तपितनाशक है ।यह नाड़ियों की क्षीणता , हड्डियों के चोट - टूट आदि में बेहद लाभदायक होता है । ह्रदय रोगी के लीये बहुत ही लाभदायक होता है ।

 प्रमुख फायदे - 

( 1 ) ह्रदय रोग में - अर्जुन के छाल दूध में पकाकर आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर पीये ।ह्रदय रोग में बहुत ही लाभ होता है ।इसे दिल की गति स्वभाविक होता है । दूसरी बिधि - अर्जुन के छाल को पानी में चाय की तरह उबालकर इसे हल्का गुनगुने होने के बाद सुबह चाय की तरह पीये ।इसे हार्ट के मरीज को बहुत ही फायदा होता है ।और धीरे -धीरे हार्ट सही काम करने लगता है ।


 ( 2 ) घाव - किसी भी प्रकार के पुराने घाव पर अर्जुन की छाल को पानी में उबाल कर काढ़ा बनाले ।और इसे छान कर घाव को अच्छी तरह से धोएं । इसे घाव कीटाणु रहित हो जाता है । फिर घाव पर कोई मरहम लगादे । 

 ( 3 ) हड्डी टूटना - अर्जुन की छाल को पीस कर रख ले । अर्जुन के छाल लगभग तीन ग्राम , 5 ग्राम चीनी , 5 ग्राम घि के साथ सुबह - शाम खाये । हड्डी टूटने पर अन्य दवा के साथ इसके सेवन से हड्डी बहुत ही जल्द जूट जाता है और हड्डी को मजबूती प्रदान करता है ।

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

स्त्रियों के रक्त प्रदर में अडूसा एक चमत्कारी औषधि है


स्त्रियों के रक्त प्रदर में अडूसा चमत्कारी औषधि है । अडूसा ( Malabar nut tree ) के गुण  


 अडूसा एक चमत्कारी औषधि है । अडूसा का पौधा छोटा और अनेक शखाओ वाला झाड़ीनुमा होता है ।इसका तना मजबूत होता है । पत्तिया 5 से 7 इंच लम्बी और 2 से 3 इंच तक चौड़ी और आगे की ओर नुकीली होती है ।इसमें सफेद रंग के फूल गुच्छो के रूप में शरद ऋतू में आते है ।इसका फल आगे से मोटा व पीछे से चपटा और चार बिज वाला होता है । 

संस्कृत में - वासक , बाजदन्त । मराठी में- अडुलसा ।बंगाली में- वाकस ।गुजराती में - आडुशो । फ़ारसी में - ख्वाजा ।हिंदी में अडूसा । और लैटिन में - अधाटोडा वासिका कहते है ।
 यह पूरे भारत में खण्डहरों , नदी - तलाबो , सुनसान इलाको में स्वंय उग आता है । यह मुख्य रूप से यह हिमालय के पास तराई वाले इलाको बिहार , उत्तर प्रदेश , बंगाल , मध्य भारत में पाये जाते है । अडूसा कसैला , लघु , स्वर व ह्रदय को हितकर , कफ - पित , रक्त पित्त , कृमी , क्षय रोग , ज्वर , प्रमेह , रक्त विकार और कमला का नाश करने वाला होता है । इसके पत्ते छाल कब्ज , अजीर्ण , खांसी , प्रसूता के कष्ट में लाभकर होता है ।

 प्रमुख फायदे :- 

(1 ) सर दर्द - अडूसा के थोड़ी सी सुखी पत्ती को पानी में डाल कर उबाले जब पानी उबल जाय तो उसमे आवश्यकतानुसार दूध और चीनी डाल कर चाय बनाले । और छान कर पी ले । इस तरह सुबह शाम चाय पिने से अकसर सर दर्द होने वाला या बना रहने वाला सिरदर्द ठीक हो जाता है । 

 ( 2 ) खांसी - अडूसा के पत्ते का अर्क निकाल कर इसमें जरा सा नमक दाल कर गुनगुना क्र पिये ।इसे खांसी मिट जाती है 

 ( 3 ) जुकाम - अडूसा के एक कप चाय में पिसी हुई काली मिर्च 1 चुटकी , पिसी मिश्री एक चम्मच , और एक चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह शाम ले इसे जुकाम समाप्त हो जाता है ।

 ( 4 ) मुँह के छाले - एक लीटर पानी में अडूसा के 20 ग्राम पत्ता और 20 ग्राम जड़ के छाल को दाल कर उबाले । उबल जाने के बाद जितना शन हो जाय उतना गर्म पानी से दिन में तीन चार बार कुल्ला करने से मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे ।

 ( 5 ) टी.बी. की खांसी - अडूसे की कोमल व ताजा पत्तियां लेकर अपने हाथो से मसलकर किसी चौड़े मुख के कांच के वर्तन में डाल दे । पत्तियो से दोगुनी चीनी भी दाल कर उसे खूब हिला डोला कर कपड़े से वर्तन का मुंह बन्द कर लगभग 45 दिनों तक धुप में रखे । ततपश्चात इस अडूसे के गुलकन्द को सुबह शाम एक चम्मच ले इसे टी.बी. रोगी का खांसी एवं पुरानी से पुरानी खांसी ठीक हो जाती है ।

 ( 6 ) रक्त - पित्त - 10 ग्राम अडूसे के पत्ते के रस के साथ 5 ग्राम चीनी मिलाकर 2 से 3 बार चाटने पर शर्तिया रक्त - पित्त मिट जाता ।

 ( 7 ) फोड़ा - फोड़ा निकलना शुरू ही हुआ हो तो उस पर अडूसा के पत्ते को पीस कर लेप लगाने से फोड़ा बैठ जाता है । ( 8 ) स्त्रियों में रक्त प्रदर - 10 ग्राम अडूसे के पत्ते का रस और 10 ग्राम मिश्री को मिलाकर रोजाना 3 से 4 बार लेने से स्त्रियों का रक्त प्रदर 7 से 8 दिनों में समाप्त हो जाता है ।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

मुलहठी ( Liquorica root ) के गुण



मुलहठी ( Liquorica root ) के गुण

मुलहठी को संस्कृत में - मधुयष्टि, यष्टिमधु । हिंदी में - मुलहठी , मुलेठी , मौरेठी । मराठी में - जेष्ठिमध । तमिल में -अतिमधुरम । गुजराती में - जेठीमध ।अरबी में - अस्लुस्सुस और लैटिन में - गिलसिराइज ग्लेब्रा के नाम से जानते है । 


          मुलहठी का पेड़ 2 से 4 फुट तक ऊँचा और झाड़ीनुमा होता है ।इसके पत्ते आयताकार नुकीले होते है ।इसके फूल गुलाबी और खून के रंग के होते है ।इसके चपटे फल में दो से चार बिज होते है ।इसकी जड़े लम्बी , मोटी , मटमैली और अंदर से कुछ पिली होती है । इसकी जड़ का ही अधिक प्रयोग होता है । यह भारत में जम्मू , कश्मीर में बहुतायत मात्रा में मिलता है । इसके अलावे ईरान , अरब , और यूरोप में भी मिलता है । 


यह मधुर , शीतल , त्रिदोष नाशक , मृदुरेचक , वीर्यवर्ध्दक , वातपितनाशक , है । यह खांसी , जुकाम , स्वर की गड़बड़ी , गले के रोग , चरम रोग , केशो के रोग , सूजन ,वमन , प्यास की अधिकता , आदि में बहुत ही लाभप्रद है ।मुलहठी का उपयोग अधिक मात्रा में नही करनी चाहिए । 


 खांसी में - मुलहठी के जड़ को पानी से साफ धोकर छोटे छोटे टुकड़े करके प्रत्येक दो से तीन घण्टे बाद इस वक टुकड़े को मुँह में डालकर चूसे ।इसे खांसी में बहुत ही जल्द आराम मिल जाता है । 

 पेशाब में रक्त आने पर - मुनाका 10 पीस मुलहठी 3 ग्राम दोनों को 250 ग्राम दूध में दाल कर पका ले । इसे आग से उतार कर ठंडा कर ले ।फिर मुनका की चबाकर खाजाये ।और दूध को पी जाए ।इसे थोड़ी ही देर में पेशाब खुलकर हो जाएगा । 

 पौरुष बल बढ़ाने के लिए - 5 ग्राम मुलहठी के चूर्ण को रात के सोने से पहले शुद्ध देशी घी के साथ चाट जाए ।इसे धातु पुष्ट होती है ।मर्दानी ताकत बहुत ही बढ़ जाती है ।इसका प्रयोग 40 से 45 दिनों लगतार करनी चाहिए । 

 दूध बढ़ाने के लिए - मुलहठी 50 ग्राम , शनतावर 200 ग्राम दोनों कूट - पीस कर चूर्ण बनाले ।इसमें से 20 ग्राम चूर्ण 250 ग्राम दूध और 250 ग्राम पानी में उबाले ।जब जल कर आधा हो जाय तो उसे ठंडा होने के बाद थोड़ी सी चीनी या मिश्री मिलाकर रोगी को पिलादे । इस तरह दो से तिन दिनों में ही माता के स्तनों में पर्याप्त दूध उतर जायेगा । मुलहठी के गुणों का आयुर्वेद में विस्तार से वर्णन है ।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

शतावर ( shtawawar )के गुण -पौरुष बल बढ़ाने और स्त्रियों का दूध बढ़ाने में रामबाण का काम करता है


शतावर ( shtawawar )के गुण










 इसका बहुत ही महत्व है ।बहुत से रोगों को दूर इसके सेवन से किया जा सकता है इसका विस्तार से वर्णन है । शतावर को संस्कृत में- शतावरी , शातमुलि ।हिंदी में - शतावर ।तमिल में - सडावरी । तेलगु में - चल्ला । लैटिन में एस्पेरेगस रेसिमोसस कहते है ।


 इसका पेड़ काँटेदार बेल की तरह होता है । इसकी शखाये चिकनी और तिकोनी होती है । इसके पत्ते आधा से एक इंच लम्बे होते है । जो की दो से छः पत्तो के गुच्छे के रुप में होते है ।इसके फूल छोटे , सुगन्धित , या गुलाबी रंग के होते है ।इसके फूल एक बार में हजारो की संख्या में आते है जिसे पूरा की पूरा पेड़ ढँक जाते है । इसके फल लाल रंग के गोल छोटे और चमकदार होते है । इसकी जड़े गुच्छे के रूप में होते है यही जड़े औषधि के रूप में काम आती है ।


 यह भारत के लगभग सभी समशीतोष्ण स्थानों में पायी जाती है । यह हिमालय एवं अरावली के पर्वत क्षेत्र में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है ।शतावर लगभग सभी किराने के दुकानों में मिल जायेगे ।


 फल गुण - यह मधुर , कटु , चिकनी , शीतल , पौष्टिक , वीर्यवर्ध्दक , बलकारक , नवयौवन प्रदायक होता है ।इसके सेवन से बलवीर्य में बृद्धि होती है और पुरुषो में मर्दाना ताकत बढ़ जाती है । यह स्त्रियों के गर्भाशय शक्ति प्रदान करती है और माता के स्तनों में दूध बढ़ाती है । यह मस्तिष्क , नेत्र , ह्रदय , नाड़ी आदि के समस्त रोगों को दूर करके उन्हें शक्ति प्रदान करती है ।


 प्रमुख फायदे - (1 ) पेशाब में रुकावट -40 ग्राम सुखी शतावर को कूट कर पानी के साथ पीस ले और उसे कपड़े से छान कर बराबर मात्र में दूध के साथ ले । इसे शीघ्र ही खुलकर पेशाब होने लगेगा । या ताज़ी शतावर का 25 ग्राम रस गाय के दूध के साथ पिलादे इसके पिलाने के कुछ ही देर में पेशाब चालु हो जाएगा ।


( 2 ) पौरुष बल बढ़ाने के लिये -( a ) 100 ग्राम सुखी शतावर को कूट कर महीन कपड़े से छान कर चूर्ण बनाले एवं 10 दिन सुबह नास्ते के बाद एक ग्लास दूध से ले ।इसे बल - वीर्य बढ़ जाता है ।


(b) 100 ग्राम कौंच के बिज , 100 ग्राम अश्वगन्धा , 100 ग्राम मुसली , 100 ग्राम शतावर सबको अच्छी तरह से कूट कर महीन चूर्ण बनाले और 5 - 5 ग्राम चूर्ण सुबह - शाम दूध के साथ ले ।इसे नपुंसकता , ताकत का अभाव , चिड़चिड़ापन , निराशा आदि की समस्या दूर हो जाती है ।काम इच्छा को तेज कर देती है । इसका सेवन गर्मी कदिनों में नही करनी चाहिये ।


( c ) सुखी शतावर 10 ग्राम , मिश्री 100 ग्राम दोनों को कूट क्र महीन चूर्ण बनाले ।और इसमेसे 5 ग्राम शुध्द देशी घी में मिलाकर चाट कर एक ग्लास दूध पि ले ।इसे स्वप्नदोष , शीघ्रपतन आदि समाप्त हो जाती है ।इसका सेवन गर्मी के मौसम में वर्जित है ।


 ( 2 ) बांझपन - सुखी शतावर का चूर्ण 5 ग्राम 10 ग्राम घी के साथ चाट कर एक ग्लास गुनगुना दूध पी ले ।इसका एक से डेढ़ माह के सेवन से ही स्त्रियों के गर्भाशय की समस्त विकृतियां दूर हो जाती है ।जिसे गर्भ स्थापना में सहयोग मिलती है ।


 (3) स्त्रियों के दूध बढ़ाने के लिये -200 ग्राम शतावर को कूट कर चूर्ण बनाले ।और इसे प्रतिदिन 5 ग्राम दूध के साथ सुबह शाम दे ।इसे माता के स्तनों का दूध बढ़ जाता है ।प्रसव में आई कमजोरी भी दूर हो जाती है ।

धतूरा ( thorn apple ) धतूरे के बिज सेक्स पावर को बढ़ाता है ।


धतूरा ( thorn apple ) धतूरे के बिज सेक्स पावर को बढ़ाता है ।

धुतुर प्राय समूच भारत में पाया जाता है ।इसका पौधा 3 से 4 फुट ऊँचा होता है ।इसकी पत्तिया 6 - 7 इंच लम्बा आगि से नुकीली होता है ।इस पर सफेद और नील रंग के फूल आते है । इसके फल हरे रग के कटहल की तरह अनेक काँटेदार होता है ।इसमें अनेक छोटे छोटे चीपटे सफेद या भूरे बिज होते है ।धतूरा दो प्रकार के होता है काल धतूरा , सफेद धृतरा । दोनों के गुण सम्मान होते है ।

      इसे संस्कृत में कनक , धृत , धत्तूर , मातुल ।हिंदी में - धतूरा । मराठी में धोतरा । लैटिन में इसे दतूरा स्ट्रोमोनियम कहते है ।

 गुण - यह ज्वर , घाव , कृमी , खुजली , कुष्ट , दामा , जूं आदि का नाश करने वाला होता है ।     

फायदे -  (1) पौरुष बल के लिए - धतूरे के बिज और काली मिर्च दोनों बराबर बराबर लेकर मिला ले इसे कूट कर छान ले ।फिर इसे पानी के द्वारा छोटी छोटी गोली बनाले । दो गोली प्रति दिन सोने के पहले दूध के साथ ले ।इसे स्वप्नदोष , शीघ्रपतन , धातुस्राव आदि रोग दूर होजाते है । 

 नोट : इसे गर्मी के मौसम में न ले ।एवं प्रयोग काल में गरिष्ठ भोजन न खाये । 

   ( 2 ) पेट में कीड़े - 150 ग्रस्म में मठ्ठे में धतूरे के ताजे पत्ते के 5 बून्द रस टपका कर सुबह पि जाए । दो से तीन दिनों के प्रयोग के बाद पेट के कीड़े स्वतः मल के रास्ते मर कर बाहर आजायेगें । 

 ( 3 ) पुराना जुकाम - धतूरे के बिज 50 ग्राम आधा लीटर पैनी में उबाले । जब पैनी लगभग 150 ग्रामबचे तो उसे आग से उतार कर छान ले । फिर उसमें 50 ग्रस्म मुनाक दाल कर आग पर चढ़ा दे जब सारा पानी सुख जाय तो मउनके को धुप में सुख ले और आधा मुनाक रोज खाये इसे जुकाम आवश्य ठीक हो जायेगा ।

 (4 )स्तन की सूजन - धतूरे के पत्ते के ऊपर पिसी हुई हल्दी लगाले ।फिर उसको हल्का सा गर्म करके सूजन वेस्ली जगह पर बांध दे ।दो तीन तक प्रयोग करने से स्तन का सूजन और दर्द समाप्त हो जाता है ।

 नोट : धतूरा नशीला औए जहरीला होता है अतः कभी भी सीधे न खाये ।

आँवला (indian goose berry )के गुण - पौरुष बल बढ़ाता है आँवला





आँवला (indian goose berry )के गुण - पौरुष बल बढ़ाता है आँवला


आँवला इस धरती का अमृत फल है । आँवला एक ऐसा फल है जिसके हजारो गुण है ।यह लगभग पुरे विश्व में कहीँ कम तो कहीं बहुतायत मात्रा में पाया जाता है । आँवला को संस्कृत में धात्री फल , आमलकी ।हिंदी में - आँवला , आमला । बंगाली में - अम्ला । फ़ारसी में - आमलह ।अरबी में - आमलज । लैटिन में - एम्बेलिक आफिसिनेलिस के नामो से जाना जाता है । आँवला का पेड़ मध्यम अकार का अनेक शाखाओं वाला होता है ।इसके पत्ते हरे और यह इमली के पत्ते की तरह होता है । यह बसन्त ऋतू में हराभरा हो जाता है और इसमें पिले रंग के फूल आते है । जुलाई -अगस्त में इस पर पीलापन लिये हुऐ हरे रंग के गोल चिकने फल आते है ।जिन पर छः धारिया होती है । इसकी गुठली कड़ी होती है ।इसका स्वाद कषाय और खट्टा होता है । यह कषाय , हल्का , शीतल , खट्टा , मधुर , त्रिदोष नाशक , दीपन , वीर्यवर्द्धक , रेचक , दाहनाशक , और जवानी को स्थिर रखनेवाले होते है । इसमें विटामिन c भरपूर मात्रा में पाये जाते है ।जो आँवले के सूखने या उबालने पर भी नष्ट नही होता है । आयुर्वेद में इसका बहुत सम्मान है और इसके हजारो फायदे का वर्णन है । वैसे तो आँवले के हजारो फायदे है । इनके प्रयोग से हजारो रोगों का सफल इलाज किया जाता है । आँवले के फल एवं पत्ती दोनों ही लाभकारी होते है ।इसके कुछ निम्न फायदे का वर्णन करता हूँ जो इस प्रकार है ।

प्रयोग विधि :- 

( 1 ) खुनी पेचिश - 2 ग्राम आँवले के पत्ती कोपिस कर इसमें जरा सी गुड़ मिला कर प्रतिदिन दो तीन बार चाटे इसे कुछ ही दिनों में खुनी पेचिश जड़ से समाप्त हो जायेगी । 

 ( 2 )हाथ - पैरो में जलन - शाम को आँवला को कुचल कर पानी में भिगो दे । अगले दिन इसे हाथ पैर तीन - चार बार धोये । साथ ही आँवले के चूर्ण को थोड़े से शहद मिलाकर सुबह शाम चाटे । कुछ ही दिनों में हाथ पैरो का जलन समाप्त हो जाएगा । ( 3 ) पित्त की दाह और गर्मी -आँवले की चटनी बनाकर चाटने या शिकंजी पिने से पित्त दाह और गर्मी नष्ट हो जाती है । 

 ( 3 ) लू और गर्मी से बचाव - गर्मियों के दिनों में सुबह शाम आँवले का एक एक मुरब्बा खाये पुरे गर्मी के मौसम में इसे खाये । इसे लू से बचाव होता ही है साथ ही दिमाग ठंडा रखता है । 

 ( 4 ) दांत निकलते समय - जिन बच्चों को दांत निकलने को है उन बच्चों के मसूढ़ों पर आँवले के रस दिन में दो तीन बार मल दे इसे दांत बिना परेशानी के निकल जायेगे । 

 ( 5 ) स्वप्नदोष - सूखे आँवले के चूर्ण 100 ग्राम , चीनी या मिश्री 200 ग्राम इन्हें मिलाकर रखले ।प्रत्येक दिन सुबह बिना कुछ खाये एक छोटी चम्मच चूर्ण खाकर पानी पि ले ।पन्द्रह बिस दिनों में स्वप्न दोष आना बन्द हो जाएगा ।

 ( 6 ) पुरषो में शारीरि ताकत और मर्दानी ताकत बढ़ाने के लिये - * सोंठ - 50 ग्राम *असगन्ध -150 ग्राम * गठली रहित आँवले का चूर्ण - 200 ग्राम * मिश्री - 200 ग्राम । इन सबको कूट पीस कर छान ले । प्रतिदिन दो से चार चम्मच चूर्ण सुबह शाम खा कर पानी या दूध पी ले । इसे प्रमेह प्रदर , कमर दर्द , सुस्ती दूर करके , वीर्य ताकत , पौरुष बल , शारीरिक ताकत , बुद्दि और स्फूर्ति बढ़ाता है । इसे दिमागी काम करने वाले जरूर खाये । इसके सेवन से बाल चमकीले होते है ।बाल झड़ना रुक जाता है । बाल धीरे धीरे काले होजाते है । 

 नोट - 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इस चूर्ण को न खाये । आँवले को आयुर्वेद में अमृत फल के नाम से जाना जाता है ।आँवले को देव फल भी कहते है ।

अश्वगन्धा के गुण


अश्वगन्धा के गुण आयुर्वेद के इन नुस्खों को आजमायें अश्वगन्धा (winter cherry ) अश्वगन्धा एक फायदे अनेक ~~~~~~~~~~~~~~~ अश्वगन्धा यह वर्ष ऋतू में स्वयं उग आता है ।यह मूलतः गर्म क्षेत्रो में पाया जाता है ।इसका पौधा लगभग डेढ़ मिटर ऊँचा हरा रोम युक्त होता है ।इसके फल लम्बे कवच वाले हरे रंग के व पकने पर लाल होता है ।इसके ताजे जड़ से घोड़े के पेशाब की तरह गन्ध आती है । इसीलिये इसे अश्वगन्धा कहते है ।इस पर सितम्बर से अप्रैल तक फूल - फल लगते है । यह लगभग पुरे विश्व में पाया जाता है ।इसे संस्कृत में पलाशपर्णी , अश्वगन्धा , पुष्टिदा हिंदी में- असगन्ध, असगन्धी ।लैटिन में विदानीय सोमनिफेरा के नामो से जाना जाता है ।इसे किराने के दूकान से खरीदे जा सकते है । फायदे - अश्वगन्धा गर्म , शक्तिवर्धक , स्तम्भक , वायु नाशक और शरीर को पुष्टि करने वाला है ।यह बीर्य बढ़ाता है और पर्याप्त ताकत देता है ।इसका सेवन पुरुष - स्त्री , बालक एवं बृद्ध सबके हितकर में है ।इसके सेवन कर अनेक रोगों को दूर किया जाता है । प्रयोग बिधि - (1) पौरुष बल बढ़ाने के लिए -सबसे पहले अश्वगन्धा का चूर्ण बनाकर इसे कपड़ा से छान ले । अश्वगन्धा चूर्ण - 6 ग्राम शुद्ध देशी घि - 5 ग्राम और शहद - 10 ग्राम इन सब को एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ रात को सोने से पहले ले । एक महीनो के प्रयोग से ही शारीरिक ताकत बढ़ जायेगी । नोट - इसका प्रयोग गर्मियों में न करे । (2) श्वेत प्रदर - अश्वगन्धा के चूर्ण को कपड़ा से छान ले । अश्वगन्धा चूर्ण - 5 ग्राम मिश्री - 5 ग्राम प्रतिदिन एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ सुबह और सोने से पहले ले । कुछ दिनो के प्रयोग से श्वेत प्रदर के साथ - साथ कमजोरी और कमर दर्द भी दूर होता है । शारीर में स्फूर्ति आजाती है । ( 3 ) दूध बढ़ाने के लिये - यदि किसी स्त्री को पर्याप्त दूध न उतरता हो तो 150 ग्राम सन्तावर और 150 ग्राम अश्वगन्धा को कूट पीस कर कपड़ा से छान ले ।अब इस चूर्ण में से 10 ग्राम चूर्ण को 100 ग्राम पानी में पकाये लगभग पक कर आधे हो जाए तो इसे आग से उतारकर छान कर मिश्री और दूध के साथ रोजाना सुबह शाम ले ।कुछ ही दिनों के सेवन से स्त्रियों के स्तन में दूध की मात्रा बढ़ जायेगी । (4) वायु विकार - सोंठ - 100 ग्राम अश्वगन्धा -200 ग्राम और मिश्री। - 300 ग्राम तीनो को चूर्ण बनाकर दो चम्मच एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ सुबह शाम ले । कुछ ही दिनों के सेवन से सभी प्रकार जे वायु विकार जैसे -वदन दर्द, गठिया दर्द , मांस पेशियों का दर्द , स्नायु की कमजोरी , अनिद्रा , कफ विकार , आदि नष्ट हो जाते है ।पाँचन क्रिया ठीक रहती है । (5 ) अश्वगन्धा रसायन - अश्वगन्धा चूर्ण 300 ग्राम , सोंठ पिसी 50 ग्राम , सितोपलादि चूर्ण 100 ग्राम , सत्व गिलोय 50 ग्राम , पिसी हुई मिश्री 150 ग्राम इन सबको पीस कर अच्छी तरह से मिलाकर किसी शीशे के जार में रखले । दो छोटे चम्मच चूर्ण एक कप पानी या दूध के साथ सुबह शसम ले । इसे चार वर्ष से ज्यादे के उम्र के बच्चों को भी दे सकते है । इस अश्वगन्धा रसायन के सेवन से शारीरिक और मानसिक ताकत , रोग प्रतिरोधक ताकत , बच्चों का शारीरिक विकास और महिलाओं के स्तन के विकास पर बढ़िया प्रभाव पड़ता है ।मानसिक श्रम करने वाले बच्चों , शिक्षक , क्लर्क आदि के लीये यह रामबाण का काम करता है ।

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

अश्वगन्धा के गुण


                  अश्वगन्धा के गुण

आयुर्वेद के इन नुस्खों को आजमायें अश्वगन्धा (winter cherry ) अश्वगन्धा एक फायदे अनेक ।


 अश्वगन्धा यह वर्ष ऋतू में स्वयं उग आता है ।यह मूलतः गर्म क्षेत्रो में पाया जाता है ।इसका पौधा लगभग डेढ़ मिटर ऊँचा हरा रोम युक्त होता है ।इसके फल लम्बे कवच वाले हरे रंग के व पकने पर लाल होता है ।इसके ताजे जड़ से घोड़े के पेशाब की तरह गन्ध आती है । इसीलिये इसे अश्वगन्धा कहते है ।इस पर सितम्बर से अप्रैल तक फूल - फल लगते है । यह लगभग पुरे विश्व में पाया जाता है ।इसे संस्कृत में पलाशपर्णी , अश्वगन्धा , पुष्टिदा हिंदी में- असगन्ध, असगन्धी ।लैटिन में विदानीय सोमनिफेरा के नामो से जाना जाता है ।इसे किराने के दूकान से खरीदे जा सकते है । फायदे - अश्वगन्धा गर्म , शक्तिवर्धक , स्तम्भक , वायु नाशक और शरीर को पुष्टि करने वाला है ।यह बीर्य बढ़ाता है और पर्याप्त ताकत देता है ।इसका सेवन पुरुष - स्त्री , बालक एवं बृद्ध सबके हितकर में है ।इसके सेवन कर अनेक रोगों को दूर किया जाता है ।

 प्रयोग बिधि - (1) पौरुष बल बढ़ाने के लिए -सबसे पहले अश्वगन्धा का चूर्ण बनाकर इसे कपड़ा से छान ले । अश्वगन्धा चूर्ण - 6 ग्राम शुद्ध देशी घि - 5 ग्राम और शहद - 10 ग्राम इन सब को एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ रात को सोने से पहले ले । एक महीनो के प्रयोग से ही शारीरिक ताकत बढ़ जायेगी । नोट - इसका प्रयोग गर्मियों में न करे । 

 (2) श्वेत प्रदर -अश्वगन्धा के चूर्ण को कपड़ा से छान ले । अश्वगन्धा चूर्ण - 5 ग्राम मिश्री - 5 ग्राम प्रतिदिन एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ सुबह और सोने से पहले ले । कुछ दिनो के प्रयोग से श्वेत प्रदर के साथ - साथ कमजोरी और कमर दर्द भी दूर होता है । शारीर में स्फूर्ति आजाती है ।

 ( 3 ) दूध बढ़ाने के लिये यदि किसी स्त्री को पर्याप्त दूध न उतरता हो तो 150 ग्राम सन्तावर और 150 ग्राम अश्वगन्धा को कूट पीस कर कपड़ा से छान ले ।अब इस चूर्ण में से 10 ग्राम चूर्ण को 100 ग्राम पानी में पकाये लगभग पक कर आधे हो जाए तो इसे आग से उतारकर छान कर मिश्री और दूध के साथ रोजाना सुबह शाम ले ।कुछ ही दिनों के सेवन से स्त्रियों के स्तन में दूध की मात्रा बढ़ जायेगी । 

 (4) वायु विकार - सोंठ - 100 ग्राम अश्वगन्धा -200 ग्राम और मिश्री। - 300 ग्राम तीनो को चूर्ण बनाकर दो चम्मच एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ सुबह शाम ले । कुछ ही दिनों के सेवन से सभी प्रकार जे वायु विकार जैसे -वदन दर्द, गठिया दर्द , मांस पेशियों का दर्द , स्नायु की कमजोरी , अनिद्रा , कफ विकार , आदि नष्ट हो जाते है ।पाँचन क्रिया ठीक रहती है । 

(5 ) अश्वगन्धा रसायन -अश्वगन्धा चूर्ण 300 ग्राम , सोंठ पिसी 50 ग्राम , सितोपलादि चूर्ण 100 ग्राम , सत्व गिलोय 50 ग्राम , पिसी हुई मिश्री 150 ग्राम इन सबको पीस कर अच्छी तरह से मिलाकर किसी शीशे के जार में रखले । दो छोटे चम्मच चूर्ण एक कप पानी या दूध के साथ सुबह शसम ले । इसे चार वर्ष से ज्यादे के उम्र के बच्चों को भी दे सकते है । इस अश्वगन्धा रसायन के सेवन से शारीरिक और मानसिक ताकत , रोग प्रतिरोधक ताकत , बच्चों का शारीरिक विकास और महिलाओं के स्तन के विकास पर बढ़िया प्रभाव पड़ता है ।मानसिक श्रम करने वाले बच्चों , शिक्षक , क्लर्क आदि के लीये यह रामबाण का काम करता है ।

पौरुष बल बढ़ाने के लिये आयर्वेद के इन नुस्खों को आजमायें


पौरुष बल को प्राप्त करने के लिये आयुर्वेद के इन नुस्खों को आजमायें

अश्वगन्धा (winter cherry ) अश्वगन्धा यह वर्ष ऋतू में स्वयं उग आता है ।यह मूलतः गर्म क्षेत्रो में पाया जाता है ।इसका पौधा लगभग डेढ़ मिटर ऊँचा हरा रोम युक्त होता है ।इसके फल लम्बे कवच वाले हरे रंग के व पकने पर लाल होता है ।इसके ताजे जड़ से घोड़े के पेशाब की तरह गन्ध आती है । इसीलिये इसे अश्वगन्धा कहते है ।इस पर सितम्बर से अप्रैल तक फूल - फल लगते है । यह लगभग पुरे विश्व में पाया जाता है ।इसे संस्कृत में पलाशपर्णी , अश्वगन्धा , पुष्टिदा हिंदी में- असगन्ध, असगन्धी ।लैटिन में विदानीय सोमनिफेरा के नामो से जाना जाता है ।इसे किराने के दूकान से खरीदे जा सकते है ।


अश्वगन्धा के फायदे - अश्वगन्धा गर्म , शक्तिवर्धक , स्तम्भक , वायु नाशक और शरीर को पुष्टि करने वाला है ।यह बीर्य बढ़ाता है और पर्याप्त ताकत देता है ।इसका सेवन पुरुष - स्त्री , बालक एवं बृद्ध सबके हितकर में है ।इसके सेवन कर अनेक रोगों को दूर किया जाता है । 

प्रयोग बिधि -

1 ) पौरुष बल बढ़ाने के लिए -सबसे पहले अश्वगन्धा के जड़ को कूट कर

चूर्ण बनाकर इसे कपड़ा से छान ले । अश्वगन्धा चूर्ण - 6 ग्राम शुद्ध देशी घि - 5 ग्राम और शहद - 10 ग्राम इन सब को एक ग्लास गुनगुने दूध के साथ रात को सोने से पहले ले । एक महीनो के प्रयोग से ही शारीरिक ताकत बढ़ जायेगी ।

 नोट - इसका प्रयोग गर्मियों में न करे ।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

सौ मर्दों की मर्दानी ताकत बकरे के अंडकोष में


सौ मर्दों की मर्दानी ताकत बकरे के अंडकोष में 


 सुश्रुत संहिता के अनुसार बकरे के अंडकोष में सौ मर्दों की ताकत होती है

आयुर्वेद में ऐसे कई नुस्खे का वर्णन है जिसे मर्दानी ताकतों को बढ़ाया जा सकता है । आयुर्वेद के चरक एवं सुश्रुत संहिता में ऐसे कई नुस्खों का वर्णन है जिसे अपना कर हम स्वस्थ और सौ मर्दानी ताकतों को प्राप्त कर सकते है ।पर हम इसे भूलते जा रहे है और इसके विपरीत दूसरे देश इसे अपनाकर फायदा उठा रहे है और तो और हमारे जड़ी बुटियों का पेटेंट भी करा ले रहे है जैसे तुलसी , निम् , अदरख आदि।और हम मन मसोस कर रह जाते है । मांस में प्रोटीन होता है यह हम सब जानते है और कुछ हद तक हमारे शरीर के लिये फायदेमंद भी है ।आयुर्वेद के चरक और सुश्रुत संहिता में भी इसका विस्तार से वर्णन है और हम यह भी जानते है की इस महान ग्रथ की रचना वैदिक धर्म का पालन करते हुए हुआ है । आज के इस भौतिक युग में मर्दानी ताकत पुरे विश्व के लिये एक बहुत बड़ी समस्या के रुप में खड़ी है । इस समस्या के निदान के लिये बहुत सारे लोग अंग्रेजी दवा खाने को मजबूर है ।जिसके साइड इफेक्ट से ये अनेको रोगों से रोगग्रस्त हो जारहे है । आपको जानकर यह आश्चर्य होगा की हमारे पूर्वजो ने आयुर्वेद में इस समस्या का अनेको नुस्खे है ।जिसे अपनाकर हम सौ मर्दों की ताकत प्राप्त कर चरम सुख की प्राप्ति कर सकते है ।हम लगातार अपनी ताकत खोते जारहे है जबकि विदेशी इस नुस्खे को अपनाकर फायदा उठा रहे है ।

सुश्रुत संहिता के अनुसार बकरे के अंडकोष में सौ मर्दों की ताकत होती है । सुश्रुत संहिता में जानवरों तथा इन्‍सान के वीर्य का विधान भी मिलता है,  आयुर्वेद के सुश्रुत संहिता के अनुसार घी में बकरे के अंडकोष को तल कर सेंध नमक के साथ जो पुरूष खाता है वह एक सौ स्त्रियों से रमण कर सकता है । जो व्यक्ति रोज रोज बकरे के अंडकोष को पकाने और खरीद कर लाने के झंझट से बचना चाहते है ।उनके लिए भी एक रास्ता है। यूनानी मेडिसिन में "जौहर ऐ ख़ुशी " एक दवा का नाम है । यह बकरे के अण्डकोषों का सत ही होता है। आप बाज़ार से इसे ख़रीदकर दूध और शहद के साथ इस्तेमाल करें। आपको वही लाभ मिलेगा, जो कि चरक और सुश्रुत में बताया गया है। आजकल रैक्स कंपनी (Rex (U&A) Remedies Pvt. Ltd.) इसे बना रही है। अपने जीवन साथी को चरमसुख का अहसास कराइये और अपने जीवन को आनंद से भर लीजिए। आसानी से पौरुष बल प्राप्त कर बैबाहिक जीवन का आनन्द ले ।